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भारतीय इसरो(ISRO) VS पाकिस्तानी सुपार्को(SUPARCO), जानिए कौन बेहतर है...

भारतीय  इसरो(ISRO)  VS पाकिस्तानी  सुपार्को (SUPARCO), जानिए कौन बेहतर है...



 आज मैं आपको इस लेख में भारत के अंतरिक्ष के लिए काम करने वाली शक्तियों और पाकिस्तान के सुपार्को के बारे में बताने वाला हूं।

आपको इसमें इनकी स्थापना के इतिहास से लेकर अभी तक की पूरी कहानी बताऊंगा और साथ ही यह भी जानेंगे कि क्यों सुपार्को को के बाद शुरू हुई इसरो आज उन्नति में उससे कहीं आगे है।

1947 जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ उसी साल भारत और पाकिस्तान दो अलग मुल्क बना दिए गए और दोनों ने अपने अपने रास्ते को चुना और अपने अपने देश को बेहतर बनाने के लिए काम शुरू कर दिया।
दिन था 16 सितंबर साल 1961 जब पाकिस्तान ने आखिरकार एक ऐसी संस्था को स्थापित किया गया जो कि यह सोचा गया कि अंतरिक्ष में पाकिस्तान का नाम बनाएगी और शुरुआत में ऐसा हुआ भी क्योंकि सुपार्को(SUPARCO) स्थापित होने के 9 महीने बाद ही पाकिस्तान ने अपना पहला साउंडिंग रॉकेट रह बार बन्ना सा की मदद से सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया।

जिसके साथ ही पाकिस्तान उस समय अनमैंड स्पेसक्राफ्ट को लॉन्च करने वाला एशिया का तीसरा और दुनिया का 10 वा देश बन गया।

इसके साथ उस समय सुपार्को(SUPARCO) अंतरिक्ष में एक उभरती हुई संस्था के रूप में नजर आने लगी।
पाकिस्तान के एक साल बाद ही यानी कि 1962 में भारत से एक स्पेस एजेंसी को स्थापित कर दिया था।
जिसका नाम इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च रखा गया था। जिसे जवाहरलाल नेहरू और उनके मित्र और वैज्ञानिक विक्रम साराभाई ने स्थापित किया था।





जिसका नाम 7 साल बाद बदल केर इसरो(ISRO) का नाम दिया गया लेकिन तब तक भारत ने कोई भी सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च नहीं किया था। 1975 यह वही दिन था जब भारत ने अपनी आर्यभट्ट को लांच किया।
यह लांच रशिया की मदद से किया गया था क्योंकि उस समय भारत के पास खुद का कोई सेटेलाइट व्हीकल नहीं था ,जिसकी मदद सेटेलाइट को लांच किया जा सके।
यहां तक कि वह समय ऐसा था जब सेटेलाइट के सामान को तक साइकिल और बैलगाड़ी में लादकर, लांच पैड तक पहुंचाया गया था। लेकिन इसके बाद भारत ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

लेकिन जो एक चीज अभी भी भारत को चाहिए थी वह था खुद का एक लांच व्हीकल।
जिसकी टेस्टिंग 10 अगस्त 1979 को श्रीहरिकोटा आंध्र प्रदेश से किया गया। यह पहली बार था जब भारत श्रीहरिकोटा(sriharikota) से लॉन्चिंग कर रहा था। लेकिन यह एसएलबी लॉन्चिंग व्हीकल ऑर्बिट तक नहीं पहुंच पाया।
लेकिन फिर भी उसके 1 साल बाद ही यानी कि 18 जुलाई 1980 को भारत में पहला स्वदेशी सैटेलाइट रोहिणी सतीश धवन स्पेस सेंटर श्रीहरिकोटा(sriharikota) से ही एसएलवी के जरिए ही लांच किया और इस बार एसएसबी ने अपने मिशन में कामयाबी हासिल किया।
इसी के साथ भारत दुनिया का सातवां देश बन गया जो कि खुद की सेटेलाइट खुद के रॉकेट में ही लांच कर सकता था। वहीं दूसरी ओर सुपार्को  के पास अब भी अपना कोई लॉस व्हीकल(vehicle) नहीं था। यानी कि अब भी दूसरे देशों के लॉन्च व्हीकलसे ही अपनी सैटेलाइट लॉन्च करते थे।

इसके बाद 1980 से लेकर भारत में कईं रॉकेट लॉन्च किए जिसमें से दो बार रॉकेट  मिसेस को खत्म करना पड़ा।
इसी बीच 1990 में सुपरको(SUPARCO)  ने भी अपना एक आर्टिफिशियल डिजिटल सेटेलाइट बहादुरगढ़ 1990 में लांच किया लॉन्च किया गया था।

भारत के पास तो खुद की लॉन्चिंग व्हीकल पीएसएलवी(PSLV) और जीएसएलवी(GSLV) मौजूद थे।  जिनके द्वारा सैटेलाइट लॉन्च करने का खर्चा दुनिया में सबसे कम है और इसके साथ ही भारत ने साल 2000 में, 2001 में ,2002 में 2003 ,में चार ,2004 में 1 और 2005 में 2 सैटेलाइट लॉन्च कीं।

2008 में भारत ने चंद्रमा पर अपना पहला मिशन भेजा जिसका नाम चंद्रयान -1(chandrayaan-1) रखा गया।
जो कि 8 नवंबर 2008 को चंद्रमा के ऑर्बिट में दाखिल हुआ और इसके साथ ही भारत चंद्रमा पर अपना झंडा लगाने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया।




इसके साथ ही चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी भी ढूंढ निकाला जिसको बाद में नासा ने भी माना और इसके साथ चंद्रमा पर पानी की ट्रेस ढूंढ़ने वाला भारत दुनिया का पहला देश बन गया।
वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान में इसके ठीक 3 साल बाद यानी कि 2011 में चाइना की मदद से एक एडवांस कम्युनिकेशन सैटेलाइट लॉन्च की जिसको कि अगले 12 सालों तक अंतरिक्ष में अपना काम करना है।

इसके 2 साल बाद यानी कि 2013 में भारत में ऐतिहासिक कोशिश करने का फैसला किया और 5 नवंबर 2013 को आखिरकार भारत ने मंगल यानी कि मार्स पर अपना पहला अभियान बेजा।

भारतीय वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी दिक्कत थी  सॅटॅलाइट को मार्स तक पहुंचाना क्योंकि सॅटॅलाइट में इतना ईंधन नहीं था की वो  पृथ्वी से मार्स  तक की उड़ान दे सकें।
इसलिए उन्होंने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण(Gravity) का इस्तेमाल करके उसको  मार्स(MARS) की तरफ छोड़ दिया और लगभग 1 साल बाद मंगलयान मार्स की ऑर्बिट पर सही सलामत पहुंच गया।
जिससे  भारत एशिया का पहला देश बना दिया जिसने कि अपना मंगल(MARS) का मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया और भारत दुनिया का भी पहले ऐसा देश बन गया जिसने पहली ही कोशिश में मंगल मिशन में कामयाबी पाई।

इस मंगल मिशन के सेटेलाइट को मंगल तक पहुंचने का खर्च ₹6 प्रति किलोमीटर रहा जो कि किसी टैक्सी के किराए से भी कम है शुरुआत में यह प्लान किया गया था कि यह मंगलयान 6 महीने तक काम करेगा लेकिन 4 साल बाद भी यह पूरी तरह से काम कर रहा है और आज भी  जानकारियां मंगल से पृथ्वी(Earth) तक भेज रहा है।

उसी साल नवंबर 2013 में करयोगेनिक इंजन लांच किया जिसका कि पूरा मिशन तकनीक यानी कि टेक्नोलॉजी  पर था।

इसका समय 2 साल का था जो कि 2015 में खत्म हो चुका है।
23 मई 2016 को इसरो ने अपने पहले reusable स्पेस शटल को सफलतापूर्वक लॉन्च किया जो पूरी तरह से स्वदेशी था और यह अब भी टेस्ट मोड में है और अगर यह अगले 2 से 4 सालों तक सफलतापूर्वक होते रहे तो यह स्पेस शटल इसरो के स्पेस मिशन में होने वाले खर्चे को 10 गुना तक कम केर देगा।

5 फरवरी 2017 को पीएसएलवी c37 के साथ में इसरो ने एक साथ एक ही रॉकेट में 104 सेटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च कर दी और आधे घंटे बाद सारे सेटेलाइट रॉकेट से अलग अलग करके कुछ कुछ सेकंड के अंतराल में अपने अपने ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित हूँ गए।  इसमें  इसरो ने कुल 226 सैटेलाइट उनके ऑर्बिट में स्थापित कर दिए थे, जिनमें से 180 विदेशी सैटेलाइट थे।

साल 2018 में पाकिस्तान ने अपनी पहली रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट सफलतापूर्वक लॉन्च कर दी है जब कि भारत अपनी पहली रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट साल 1988 में लांच कर चुका था।

सुपार्को का फ्यूचर प्लान अच्छी सेटेलाइट तैयार करना और एक खुद का  लांच vehicle तैयार करना है जिसका पूरा होने का समय साल 2040 का रखा गया।

इसरो के भविष्य के कई सारे प्लान्स  हैं ,जिनमें वीनस पर मिशन भेजना, चंद्रयान -2(chandrayaan-2) और मार्स पर एक और मिशन भेजकर वहां एक रोबोट को भी पहुंचाना मुख्यतः शामिल है।


इस  वक्त  दोनों की देशों  की मौजूदा हालत पर नजर डाली जाए तो भारत पाकिस्तान  से कई  आगे दिखाई देता है।
यानी कि भारत से पहले शुरू होने और भारत ने पहले ही अपनी पहली सेटेलाइट लांच करने के बावजूद पाकिस्तान स्पेस एजेंसी भारत के मुकाबले कहीं पीछे छूट गयी  है।


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